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साधारण से असाधारण बनने का विज्ञान

Updated: Jan 3

“हमारे मन में अनेक प्रशन कौंधते हैं कि क्या हम् एक साधारण व्यक्तित्व से असाधारण व्यक्तित्व बन सकते हैं? क्या हमारे बच्चे, जिनमें हमें कुछ खास दिख नहीं रहा, क्या हम उन्हें साधारण बच्चे से विलक्षण बच्चा या मेधावी बच्चा बना सकते हैं?”

हम अपने आस-पास ऐसे कईं व्यक्ति देखते हैं जो बहुत विलक्षण होते हैं। उन्हें देखकर हमारे मन में अनेक प्रश्न कौंधते हैं कि क्या हम एक साधारण व्यक्तित्व से असाधारण व्यक्तित्व बन सकते हैं? क्या हमारे बच्चे, जिनमें हमें कुछ खास दिख नहीं रहा, क्या हम उन्हें साधारण बच्चे से विलक्षण बच्चा या मेधावी बच्चा बना सकते हैं? क्या हम ऊर्जाहीन व्यक्तित्व से ऊर्जावान व्यक्तित्व बन सकते हैं? एक व्यक्ति जो डरा हुआ रहता है, सहमा हुआ रहता है, बॉस की डांट खाता रहता है, क्या वह ऐसे व्यक्तित्व में परिवर्तित हो सकता है जो कभी डरे नहीं, जो कभी खौफ़ न खाए, जिस पर बॉस चिड़चिडाए नहीं। क्या हम खुशमिजाज व्यक्तित्व के रूप में परिवर्तित हो सकते हैं जो अपनी हँसी से वातावरण को गुंजायमान कर दे? जो हर समय झगड़ने से बचते हों, जिनसे बच्चे प्यार करते हों? यह हमारा दुर्भाग्य है कि बदलते ज़माने के साथ प्रेम तेज़ी से समाप्त हुआ है। न केवल हमारे परिवार में यह प्रेम कम हुआ है बल्कि हमारे पड़ोसियों के साथ भी प्रेम में कमी आई है। आलोचनाओं का जो दौर शुरू होता है, वह खत्म ही नहीं होता। इस विषय पर गहराई से सोचने और लगातार बात करने की ज़रूरत है।


सबसे पहली बात यह है कि क्या Destiny या नियति या प्रारब्ध अंतिम है? क्या नियति को बदला जा सकता है? क्या Destiny के पीछे कोई परा नियति या Meta-Destiny है? मेरा उत्तर है- हाँ, Destiny या नियति को बदला जा सकता है। में जिस एस्ट्रोलॉजी की प्रैक्टिस करता हूँ वह नियति को अंतिम नहीं मानती हैं। मानवीय सोच कुछ इस तरह की है जो नियति को अंतिम मानती है। लेकिन अगर हम बहुत गहराई से चीजों का अवलोकन करें या फिर हम खुद को ही गहराई से परखने की कोशिश करें तो हमें ज्ञात होगा कि हम हरदम भाग्य या नियति या प्रारब्ध से लड़ते नजर आते हैं। यदि हमारा अवचेतन मस्तिष्क किसी चीज की अंतिम सत्यता को स्वीकार कर लेगा तो हम उससे कभी नहीं लड़ेंगे। हम नियति या प्रारब्ध से इसलिए लड़ते हैं ताकि हमारी चेतना का स्तर ऊँचा हो, ईश्वर की ऐसी कृपा हमें मिले और हम अपनी नियति को बदल सकें।


अगर हिंदुत्व विज्ञान की गहराई में जाएँ तो कई सिद्धांत सामने आते हैं। एक सिद्धांत है- पुनर्जन्म का दूसरा सिद्धांत है- कर्म का और तीसरा सिद्धांत है- भाग्य का । अगर भाग्य या नियति को अंतिम मान लिया जाता तो पुनर्जन्म का सिद्धांत कभी न लिया जाता। दूसरा प्रश्न यह उठता है कि अगर मान भी लिया जाए कि भाग्य अंतिम नहीं है लेकिन फिर भी भाग्य कुछ तो है। कुछ लोगों का मानना है कि भाग्य या नियति कुछ नहीं है। मैं तो जो चाहूँगा वह मुझे प्राप्त हो जाएगा। लेकिन आज तक मुझे कोई व्यक्ति नहीं दिखा, शायद ही कोई ऐसा भाग्यशाली हो! इस संबंध में हमें अनेक विचारधाराएँ मिलती है। एक व्यक्ति ने कहा, "भाग्य कुछ नहीं है। व्यक्ति जो सोचता है, उससे उसका चेतना का स्तर मजबूत होता है या जितना उसका सोचने का स्तर मजबूत होगा, उतनी ही जल्दी वह चीजों को प्राप्त कर लेगा।” लेकिन वास्तव में ऐसा होता है? आइए इसे एक उदाहरण से हम समझते हैं –


दौड़ में सभी के लिए 3, 2, 1 बोला जाता है। सभी पूरे जोश के साथ दौड़ना शुरू करते हैं। लेकिन मंजिल पर वही पहुँचते हैं जिनका भाग्य अच्छा होता है। कमी दौड़ने में नहीं है। संभव है कि किसी के दिमाग में कुछ ऐसी तकनीक आई या किसी का मनोबल ऐन वक्त पर कमजोर पड़ गया हो। इसलिए सभी लोग मंजिल पर नहीं पहुँचे। इसलिए जो केवल कर्म का दर्शन है वह सही नहीं है। वैज्ञानिक तौर से भी यह मान्य नहीं है। दूसरा पहलू होता है 'भाग्य'।

जो राम जी चाहेंगे वह होगा, जो भाग्य मे होंगा वह होगा। राम जी को इतनी फुर्सत नहीं है कि वे ये सुनिश्चत करें कि अरबों-खरबों लोगों को क्या करना है। उन्होंने हमें एक बेसिक हमारा ‘ब्रेन’ दिया है जिसे हम ‘वराह अवतार’ कहते हैं। यदि हम भी भारतीय शास्त्रों को वैज्ञानिक ढंग से पढ़ने का प्रयास करेंगे तो हमें उनकी गहराई नज़र आएगी। पूरा शरीर विज्ञान अपने आप में एक बहुत बड़ा उदाहरण है।

"व्यक्ति जो सोचता है, उससे उसका चेतना का स्तर मज़बूत होता है या जितना उसका सोचने का स्तर मज़बूत होगा, उतनी ही जल्दी वह चीज़ों को प्राप्त कर लेगा|" लेकिन वास्तव में ऐसा होता है ? आइए उदाहरण से हम समझते हैं-

वराह अवतार के द्वारा हममें सोचने और समझने की शक्ति का जन्म हुआ और यदि आप इस ग्रंथि को एनाटॉमी में देखें तो यह बिल्कुल जंगली सूअर की तरह के आकार का दिखता है जिसे संस्कृत में 'वराह' कहते हैं। यह विष्णु जी का एक अवतार माना गया। इसी जगह पर थैलेमस, हाइपोथेलेमस आया और इन्हीं के संवेग के असर से जन्म हुआ विवेक' का। विवेक का इस्तेमाल करते हुए हम अपने भाग्य में परिवर्तन कर सकते हैं।

तो इस तरह भाग्य सौ प्रतिशत अंतिम नहीं होता। अब यह प्रशन उठता है कि परिवर्तन कर सकते है तो कितना ? यह बात बहुत ही महत्वपूर्ण है और इसमे व्यक्ति प्रति व्यक्ति भिन्नता होती है। करीब 500 लोगों पर एक प्रयोग हुआ जिसमे सभी को समान प्रशिक्षण दिया गया। इसमें सभी को समान वातावरण में रखा गया। एक विशेष बात यह है कि ये 500 लोग समान भाग्य वाले थे। इस प्रयोग में सबके परिणाम अलग-अलग आए। उनमें से लगभग 100 लोगों के परिणाम बहुत अच्छे आए और उन 100 लोगों में से भी 10 लोग exemplary थे । जो लोग पढ़ाई छोड़ चुके थे , कोई मुशी तो कोई एकाउंट्स में था । उनमें भी उन्नति हुई और वे अफसर तक बन गए । यह एक बड़ी बात है । ये वे लोग थे जो अपनी वर्तमान व्यवसाय से समझौता कर चुके थे । लेकिन जब उनके अविश्वास को विश्वास दिया गया तो सकारात्मक नतीजे सामने आए । मैं इन्हें विलक्षण नतीजे मानूँगा। ये नतीजे इस ओर संकेत करते हैं कि हाँ, साधारण इंसान भी असाधारण कार्य कर सकते हैं। अब बात आती है नियति को कितना बदला जा सकता है? नियति को 50 प्रतिशत बदला जा सकता है। हम अपने थैलेमस हाइपोथैलेमस और अमेगडेला में लगभग 50 प्रतिशत बदलाव ला सकते हैं। हम अपने बाएँ और दाएँ हेमीस्फेयर में सर्वोत्तम संतुलन बना सकते है और यह नियति में बदलाव लाने के लिए काफी है। आपके अंदर महत्वाकांक्षा का एक छोटा-सा कोड़ा भी आपको किसी भी ऊँचाई तक ले जाने के लिए पर्याप्त है। लेकिन एक बात ज़रूर है कि यह उन लोगों पर बिल्कुल काम नहीं करेगा जो आलसी है, जिनमें कुछ करने की तमन्ना ही नहीं है। वही कुछ माता-पिता ऐसे भी है जो यह जानते है कि हमारे अंदर कुछ आनुवांशिक समस्याएँ है, उसके बावजूद वे अपने बच्चो को सफलता की चरम सीमा तक ले जाना चाहते हैं। हमारे शास्त्रों में ऐसे-ऐसे सिद्धांत लिखे हुए है जिनका प्रयोग करने के उपरांत बच्चों में वे आनुवांशिक समस्याएं समाप्त हो जाती थीं। यह साधारण बात नहीं है। मैंने न जाने कितने प्रयोग किए हैं। जब मै इन सि