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ध्यान क्यों?

Updated: Aug 5, 2023

अध्यात्म का अर्थ आप किसी से कहिए तो तुरन्त कहेगा कि कितनी देर का तुम्हारा ध्यान होता है, यानि आपकी आध्यात्मिकता ध्यान हो गयी। एक अन्य बात, यदि आप किसी से कहते हैं हम अध्यात्मिक हैं। तो कौन-सी पूजा करते हो, कौन-सा पाठ करते हो यह आध्यात्मिकता हो जाती है। मूलतः यह आध्यात्मिकता नहीं है। अगर आप उपनिषद को ध्यान से पढ़ें तो उपनिषद में पूजा-पाठ आवश्यक बताया है फिर...

ध्यान करें पर क्यों? ज्यादातर लोग बात करते हैं कि ध्यान कैसे करें? मैं एक चरण पहले से बात प्रारम्भ करता हूँ कि ध्यान क्यों करें? यह महत्त्वपूर्ण और गम्भीर विवेचना है आज का जो यह उद्देश्य है अध्यात्म का अर्थ आप किसी से कहिए तो जिसमें बहुत वर्षों से काम हो रहा है वह television में एक ही रूप में पहुँचा ज्योतिष वाला। इसलिए लोग Astrology ज्यादा जानते हैं लेकिन जो उद्देश्य है वह यह है कि किस प्रकार हम अपने राष्ट्र, समाज और व्यक्ति की सेवा कर सकें। वर्षों के सोचने के बाद मंचन करने के बाद, कार्य करने के बाद उत्तर केवल यही आया कि यह सिर्फ अध्यात्म से सम्भव है।


अब अध्यात्म क्या है यह परिभाषित करना बहुत जरूरी हो गया है क्योंकि हम लोग अध्यात्म को क्या समझते हैं। क्या पालथी मारकर बैठ जाना अध्यात्म समझते हैं जैसे ही आप किसी से कहिए मैं आध्यात्मिक हूँ, तो वह पूछेगा अच्छा कितनी देर ध्यान करते हो? कोई कहेगा- "मैं chanting करता हूँ मेरे लिए अध्यात्म क्या है? Chanting है।" मन्त्रोच्चारण और chanting में फर्क है। Chanting अलग चीज है पर हम शब्दों के अर्थ को समझे बिना उसका इस्तेमाल करते हैं। दूसरी चीज तुरन्त कहेगा कि कितनी देर का तुम्हारा ध्यान होता है, यानि आपकी आध्यात्मिकता ध्यान हो गयी। तीसरी चीज यदि आप किसी से कहते हैं हम अध्यात्मिक हैं तो कौन-सी पूजा करते हो, कौन-सा पाठ करते हो यह आध्यात्मिकता हो जाती है। मूलतः यह आध्यात्मिकता नहीं है। अगर आप उपनिषद को ध्यान से पढ़ें तो उपनिषद में पूजा-पाठ आवश्यक बताया है फिर हवन की क्या जरूरत है। अगर आप वेद परिपाटी से चलें तो यज्ञ की आवश्यकता है बाकी किसी वस्तु का कोई औचित्य नहीं है। उसके बाद यदि आप पुराण में जाएंगे, पुराण में भी वन्दना आवश्यक है। हर ज्ञानी पुरुष की वन्दना होती है आज भी हम वंदना करते हैं उस हिसाब से बन्दनाएं हैं, ज्यादा पूजा-पाठ नहीं है तो यह आडम्बर को जो प्रवृत्ति है यह अध्यात्म नहीं है। अध्यात्म एक जीवन को शिक्षित करने की प्रक्रिया है। अध्यात्म ईश्वर नहीं है और यह भी समझ लीजिए कि अध्यात्म से ही ईश्वर की प्राप्ति हो सकती है लेकिन अध्यात्म अपने आप में पूर्ण तब होता है जब हम उसे अपने जीवन में उतार लें।


जो हिन्दू संस्कृति है यह धर्म नहीं हैं। यह कौन-सा धर्म है जिसे धारण किया जा सकता है। यहीं से फर्क शुरू हो जाता है Religion और धर्म का|


Hinduism is a Dharm not a Religion| यह Religion की तरह से Fructified नहीं है। यहाँ समान विचारधारा नहीं है। किसी एक ऋषि-मुनि या व्यक्ति विशेष की बात Religion हो सकती है लेकिन हिन्दू संस्कृति Religion नहीं हो सकती है। यह धर्म है और धर्म क्या होता है, जो धारण किया जा सके। और अध्यात्म क्या है धर्म को मान्यता या धर्म को जानने का एक प्रयत्न है। वह हमारा अध्यात्म है और इसलिए जब तक अध्यात्म जीवन में उतरता नहीं है हम धार्मिक नहीं हो सकते हैं। आप मत कीजिए ध्यान फिर भी आप आध्यात्मिक हो सकते हैं, आप मत कीजिए पूजा फिर भी आध्यात्मिक हो सकते हैं, आप नास्तिक होने के बाद भी आध्यात्मिक हो सकते हैं। क्योकि अध्यात्म एक Cleaning है जिसमें सबसे पहले आपके मन की Moulding की जाती है उसके बाद आत्मा और मन की। Moulding में जो शुरू होता है तन के शुद्धीकरण से होता है। पहले बाहरी तन फिर अन्दर इस तन के अन्दर क्या है, नाड़ियाँ| नाड़ियों का शोधन किया जाता है और उसके उपरान्त श्वास का शोधन होता है। श्वास के शोधन के उपरान्त ध्यान की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। लेकिन यह सब तब हो सकता है जब आप सेवा में उतरें।


जैसे INA देहरादून में जहाँ Army Officer की ट्रेनिंग होती है। आपको President से Accreditation मिलने वाला है-

यहाँ तो आपको जमीन पर बैठना पड़ेगा और यहाँ तक आपको हाथों से ही खाना पड़ेगा। यहाँ आपको आपके जूते कैसे धोए जाते हैं यह भी सीखना पड़ेगा। जवान जो युद्ध में लड़ रहा है यानि Front पर है और आप यदि Second line में हैं तो किस तरीके से जवान के लिए खाना तैयार करके भेजना है यह भी आपको सीखना पड़ेगा। यह अध्यात्म में भी सीखना पड़ता है सेवा के माध्यम से Down to Earth होना पड़ेगा। इसलिए जो बहुत भव्य और भव्यता पसन्द वाले लोग हैं वह अध्यात्म अपना ही नहीं सकते।


अध्यात्मिक होने के लिए आपको जैसा ऊपर कहा Down to Earth भी होना पड़ेगा। जमीन पर भी बैठना पड़ेगा। चीजों को उस तरीके से समझना पड़ेगा जिससे अहम का नाश हो| अगर अहम है तो आप कितने भी बड़े ध्यानी, ज्ञानी हों, कुछ भी कर लीजिए आप किताबें पढ़ सकते हैं, बहुत ज्ञान हो सकता है, आप शब्दावली का बेहतरीन प्रयोग कर सकते हैं, आपकी हिन्दी, अंग्रेजी, ऊर्दू, अरबी, फारसी किसी भी भाषा में पकड़ होने के कारण आप शब्दों का सम्प्रेषण कर सकते हैं, आप Academic हो सकते हैं, एक Researcher की तरह बात कर सकते हैं लेकिन आध्यात्मिक नहीं हो सकते। अहम के साथ व्यक्ति अध्यात्म में उतर ही नहीं सकता। इस पानी में जो नाव खड़ी है उस पर वह बैठ ही नहीं सकता, सम्भव ही नहीं है। यह मैं आपको अपने अनुभव से बता रहा हूँ। भवसागर में तैरना पड़ा दसों साल| वह अनुभव मैं आपके साथ बांट रहा हूँ, तो आध्यात्मिक होने के लिए जो सबसे बड़ी आवश्यकता है, वह है अहम् का नाश| अहम् का नाश कैसे होता है जब हम बहुत Ground Reality पर आकर बात करते हैं, जब हम बिल्कुल जमीन से जुड़ें जब हम एक ऐसी जगह जाकर बैठते हैं जहाँ हमें यह महसूस होता है कि मेरी कोई हैसियत नहीं है। हाँ! इस जगह का इस्तेमाल करके मुझे जगह बनानी है लेकिन मेरी कोई हैसियत नहीं है, मेरा कोई महत्वपूर्ण अस्तित्व नहीं है, मैं बेहद साधारण व्यक्ति हूँ। आप भले ही विलक्षण हैं, बहुत बड़े पद पर हैं, उम्र बहुत ज्यादा है हर तरीके से आप इज्जत के हकदार हैं. बहुत दमदार व्यक्ति हैं। आपकी धाक है, रुतबा है लेकिन अगर आपको अध्यात्म में जाना है तो सबसे पहले आपको अपने अस्तित्व को नकारना पड़ेगा। भौतिक अस्तित्व को नहीं, आपका जो आत्मा वाला अस्तित्व है उसको नकारना पड़ेगा क्योंकि वहाँ अहम् रहता है| आप सुनते होंगे ऋषि आ गये, उन्होंने कहा- लकड़ियां बीनो, कई महीनों तक पत्थर तुड़वाते थे, तो गुस्से में आ गए शिष्य| उनमे से कोई शिष्य पूछ बैठा- आप हमसे यह सब तो करवा रहे हैं लेकिन शास्त्रों का ज्ञान कब देंगे? छः महीने बाद गुरूजी कहते हैं- यह ज्ञान तुम्हें हो नहीं सकता क्योंकि तुममें अभी भी क्रोध है। दो माह और लकड़ियां ढोओ। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि गुरूजी को लकड़ियां चाहिए थी इसका यह तात्पर्य है कि जब तक आप Ground Reality पर नहीं जाते तब तक ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकता। जब तक आप उन Ground Reality को देखोगे नहीं, पहचानोगे नहीं तब तक आपमें सेवा की भावना उत्पन्न ही नहीं हो सकती। आपके अन्दर आपके अहम का नाश, स्वार्थ का नाश नहीं हो सकता और यदि यह विकार है तो आप अध्यात्म में आ ही नहीं सकते।

इसलिए सेवा का प्रावधान रखा गया है। किसी ने यह प्रश्न किया कि क्या सेवा करनी पड़ेगी और मनुष्य का उद्देश्य क्या है?

मनुष्य का जन्म सबसे महत्त्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि उसमें परमात्मा का अंश है और ईश्वर ने मनुष्य को अधिकतम स्वतंत्रता दी है। यदि हम ईश्वरीय आदेश मान सेवा भाव का कार्य कर पाते हैं तो हमें भूत, वर्तमान, भविष्य पता हो जाता है हम बहुत बड़े-बड़े ग्रन्थों की रचना कर सकते हैं। गणेश जी ने भी लिखा था कि यदि हमारे ऊपर ईश्वर की अपार कृपा है तो ज्ञान के उस स्तर तक जा सकते हैं।


विष्णु जी के बाद यदि किसी को सब कुछ पता है तो वह हैं भृगु मुनि। ईश्वर ने एक महाअंश मनुष्य को दिया और उसे धरती पर भेज दिया, क्यों? क्योंकि ईश्वर स्वयं निर्लिप्त रहकर धरती की Maintenance करना चाहते हैं। उन्होंने धरती बना दी ब्रह्मा जी का कार्य समाप्त हो गया। फिर उसको Maintain करने के लिए उन्होंने अपने अंशों को धरती पर अवतरित करा दिया। हम सब किसी न किसी रूप में अवतार हैं। हममें से ही कोई महाअवतार हो जाता है और इसलिए जिस कार्य के लिए हमें भेजा गया है वह है कि हम धरती का संचालन करें और यही हमारा मूलभूत उद्देश्य है कि हम ईश्वरीय कार्य को आगे बढाए। यदि हम अपनी नदी को गंदा करते हैं तो यह ईश्वरीय कार्य नहीं है बल्कि हम उसके विरुद्ध जा रहे हैं। यदि हम अपने पर्यावरण को खराब कर रहे हैं, यदि हम जानवरों को सता रहे हैं तो यह गलत है, यह ईश्वरीय कार्य नहीं है, यह हम नहीं कर सकते।


पद्म पुराण, विष्णु संहिता, शिवपुराण या शिवसहिता इन चारों को पढ़िये। माटी को लगाना यानि शिव पद प्राप्त करना समझा जाता है। फलदार वृक्ष लगाना यह भी शिव पद प्राप्त करना माना जाता है। उस वक्त शिव कहीं नही कह रहे कि मेरी पूजा करो क्योंकि यदि किसी ने शिव वाटिका बना दी तो यह बहुत बड़ा कार्य हो गया। किसी ने अच्छे से घास या वृक्ष लगा दिये जहाँ से सब लाभ ले सकें तो वह लगाया गया वृक्ष आपके पुण्य में शामिल हो जाता है। सारे पुराण यही कहते हैं लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हम इसका अध्ययन नहीं करते, हमने धर्म की मनोरंजन की वस्तु बना लिया, धर्म की वैज्ञानिकता समाप्त हो गयी है और केवल मनोरंजन रह गया हैं कि हम बढ़िया सी एक कथा सुन लें, उसमें बढ़िया सा ढोलक बजा लेंगे, कुछ नाच लेंगे, मन Fresh हो जाएगा और घर पर जाकर फिर वही सब शुरू। क्योंकि वह चीज आपकी आत्मा पर प्रहार नहीं कर रही, क्योंकि वह आपको training ही नहीं दे रही और आप सुधर नहीं रहे और यह training एक दिन में हो ही नहीं सकती क्योंकि इसके लिए बरसों की साधना चाहिए। साधारण से अति विलक्षण बनना चाहिए और बन भी सकते हैं लेकिन कितने लोग वास्तव में प्रयास करते हैं। मैं आपको अपना उदाहरण बता रहा हूँ कि पिछले 20 साल से मैं जनता से जुड़कर कार्य कर रहा हूँ और इन वर्षों में मुझे कुल 100 लोग भी नहीं मिले जिन्होंने वास्तव में अपने भविष्य को बदलने की चेष्टा की है लेकिन कुछ मिले और उन्होंने प्रयास किया । अदभुत परिणाम मिले। उनके भविष्य बदले, बदलते भी क्यों नहीं, सारा खेल आत्मा का है, ऊर्जा का है लेकिन हम वहाँ तक पहुँच ही नहीं रहे हैं सिर्फ मनोरंजन में भटक गए हैं। गुरुजी का मतलब भविष्य बता देगें गुरूजी का मतलब कुछ ऐसे बोलते हुए निकल जाएंगे जिससे मेरा और मेरे परिवार का कल्याण हो जाए। चमत्कार नहीं होते हैं और खासतौर पर मैं बच्चों से कहना चाह रहा हूँ चमत्कार आपके अन्दर से उत्पन्न होता है बाहर से नहीं। यह सब ढकोसले हैं जो कहते हैं कि यह हो जाएगा या वो ही जाएगा या ऐसा होगा। समझना चाहिए कि आपके अन्दर ही ऊर्जा होती है और आप ही चमत्कार करते हो।


मूलत: अध्यात्म क्या है- सेवा है। सेवा के बाद आपको स्वाध्याय करना है। आपको पढ़ना है स्वयं को क्योंकि बाहर के ज्ञान को आध्यात्मिक ज्ञान नहीं माना जाता है जैसे किसी ने गीता रखी है, गीता पढ़ ली, श्लोक भी पढ़ लिए, संस्कृत बहुत अच्छी है, कुछ लोगों के बीच में प्रवाह से भाषण दिया और लोग उससे प्रभावित भी

मूलत: अध्यात्म क्या है- सेवा है। सेवा के बाद आपको स्वाध्याय करना है। आपको पढ़ना है स्वयं को क्योंकि बाहर के ज्ञान को आध्यात्मिक ज्ञान नहीं माना जाता है जैसे किसी ने गीता रखी है, गीता पढ़ ली, श्लोक भी पढ़ लिए, संस्कृत बहुत अच्छी है, कुछ लोगों के बीच में प्रवाह से भाषण दिया और लोग उससे...

हुए लेकिन लोग गीता ज्ञानी नहीं हैं। गीता ज्ञानी वह लोग हैं जिन्होंने गीता के ज्ञान को अपनी जिंदगी में उतारा। जिन्होंने गीता पढ़कर कम से कम एक अध्याय को तो अपने जीवन में उतारा जो श्वास क्रियाओं को जानते हैं उन्होंने उसे स्वाध्याय माना। स्वाध्याय का जो दूसरा हिस्सा है वह अन्तरण है। मैं खुद को कितना जानता हूँ जैसे internet के माध्यम से तो मैं पूरी दुनिया को जानता हूँ लेकिन खुद को कितना जानता हूँ। मेरे अंदर क्या अच्छाईयाँ हैं और क्या बुराईयां हैं मुझे नहीं मालूम।। आप स्वयं लिखकर यह जानने का प्रयत्न करिए कि आपमें क्या कमियां हैं, आपको गुस्सा क्यों आता है? सिर्फ यह कह देना कि मुझसे अन्याय नहीं देखा जाता बहुत आसान है या यह कह देना कि मुझसे कोई बुराई सहन नहीं होती और इसलिए मुझे गुस्सा आता है लेकिन मूलतः सत्य यह है कि हमेशा वह बात सही नहीं होती जो हमारी मर्जी के खिलाफ है और यह स्वाध्याय नहीं है और जब हम अपना आत्मनिरीक्षण करेगें तब हम उस अध्यात्म के शीशे में अपने आप को देखेंगे जिसमें शरीर नहीं दिखता है तो हमें पता चलेगा कि हमें चिड़चिड़ाहट इसलिए होती है कि वो काम नहीं हो रहा जो हम चाहते थे और ज्यादातर घरों और ऑफिस में लड़ाई का कारण ही यही है। ऐसा नहीं है कि हम बहुत न्यायप्रिय हैं या हम विक्रमादित्य के अवतार हैं। मूलतः हम जिद्दी व्यक्ति हैं और हममे अहम् है इसी वजह से हम दूसरों पर दोषारोपण कर देते हैं कि वह अच्छा कार्य नहीं कर रहा था इसलिए मुझे गुस्सा आ गया। स्वयं का परीक्षण करने की क्षमता व्यक्ति में नहीं है। यदि हम बैठकर अपने बारे में लिखना शुरू करेंगे तो पता चलेगा कि स्थितियां बिल्कुल विपरीत हैं। मैं तो वैसा हूँ ही नहीं जैसा मैं दुनिया को दिखाता हूँ। ईष्ट नाम की पुस्तिका का बहुत महत्व है जब आप उसमें अपने ईष्ट का नाम या राम-राम लिखना शुरू करेंगे तो धीरे-धीरे आप स्वयं जागृत होना शुरू हो जाएंगे और आप आत्मविश्लेषण करेंगे तो आपको पता चल जाएगा कि मैं वास्तव में ईश्वरीय कृपा का पात्र ही नहीं हूँ। मुझे इतनी कृपा मिलनी ही नहीं चाहिए जो मुझे दण्ड मिला, कम मिला। मैं योग्य ही नहीं। ईश्वर मुझे दिये जा रहे हैं। नब्बे प्रतिशत के साथ ऐसा ही हुआ। स्वाध्याय मूलतः यही है, उसके बाद साधना शुरू होती है और यह एक संघर्षमय प्रक्रिया है जिसमें आपको स्वयं को साधना होगा यह उतना आसान नहीं है कि हम आए बैठ जाएं और कह दें कि ध्यान नहीं लगता। ध्यान इसलिए नहीं लगता क्योंकि ध्यान से पहले वाले कार्य हुए ही नहीं।


अब बात करते हैं कि ध्यान क्यों करना है? कारण क्या है?

यह तो सब जानते हैं कि ईश्वर को प्राप्त करने के लिए ध्यान करना है लेकिन सच तो यह है कि ध्यान से ईश्वर के पास पहुंचने का रास्ता भी मिल जाता है। ध्यान में ईश्वर के घर का दरवाजा भी दिख जाएगा, लेकिन ध्यान में ईश्वर नहीं मिलेंगे क्योंकि ज्ञान की वह अगली स्थिति है जब आप ईश्वर जैसे हो जाते हैं यानि कि जब आपकी समाधि लग जाती है। इसलिए मैं कहता हूँ कि हमारा धर्म बहुत वैज्ञानिक है। यह इतना आसान नहीं है और इतनी सरलता से नहीं समझा जा सकता। आप भ्रष्टाचार मिटाने के लिए कार्य कर भी लीजिए लेकिन भ्रष्टाचार नहीं जाएगा, वह जाएगा अध्यात्म से क्योंकि अध्यात्म मन की बात करता है और भ्रष्टाचार मानसिक बीमारी है। कानून से कौन डरता है? भ्रष्ट आदमी तो बिल्कुल नहीं लेकिन हम जैसे साधारण व्यक्ति कानून से डरते हैं भ्रष्टाचारी नहीं| कानून से केवल कमजोर डरता है और कानून की जरूरत या तो कमजोर को पड़ती है या दबंग हो। दबंग कानून का गलत प्रयोग करता है मानता नहीं और कमजोर को इसलिए जरूरत पड़ती है कि शायद कानून मुझे बचा ले इसलिए लगातार कानून बनते चले गए। अमेरिका में 1767 से कोई कानून नहीं बदला। उनकी स्थिति अलग है और हमारे देश में हर साल कानून में परिवर्तन होता है। उसके बाद हमारी स्थिति यह है। इसलिए ध्यान हमें ईश्वर के पास जाने के साधन के रूप में करना है। ध्यान से ईश्वर नहीं मिलते हैं। ध्यान का जो सबसे पहला उद्देश्य है वह है स्वयं को संतुलित करना। पहले हम खुद को तो जानें फिर ईश्वर को जानने के लिए चलेंगे क्योंकि मैं खुद को ही जान लूँगा तो ईश्वर के बारे में अपने आप ही पता चल जाएगा। क्योंकि जो मेरे ईष्ट हैं उन्हीं के पास मुझे जाना है इसलिए मैं ईष्ट की पूजा और साधना को महत्व देता हूँ और यह निश्चित है कि परिवर्तन होता है और यह भी सत्य है कि इस परिवर्तन में समय लगेगा। एक प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा और उस संघर्षपूर्ण प्रक्रिया के लिए हमें तत्पर रहना पड़ेगा।


यदि काल दो व्यक्तियों को परेशान कर रहा है तो आध्यात्मिक व्यक्ति परेशान नहीं होगा पर सामान्य व्यक्ति परेशान होगा। अध्यात्म आपको सिखाता है कि स्वयं को सन्तुलित करना ही ध्यान की सबसे पहली समझ और आवश्यकता है। मुझे ध्यान इसलिए करना है क्योंकि मुझे स्वयं को सन्तुलित करना है। मुझे गुस्सा आता है इसका मतलब मैं असन्तुलित हूँ खासतौर पर असीमित क्रोध। यदि मुझमें मेरी इन्द्रियों को साधने की शक्ति नहीं है तो मैं किसे साधने जा रहा हूँ समय को कि तुम मेरे जैसे हो जाओ और मुझे सब कुछ दे दो पर मैं जब खुद को ही control नहीं कर पाता तो मैं समय को क्या control करूंगा। मैं खुद को सुधारना नहीं चाहता तो मैं अपने जीवनसाथी से कैसे सुधार की अपेक्षा रखूंगा। मुझे खुद की समझ नहीं है तो परिवार और समाज की समझ कैसे हो सकती है। अपने सन्तुलन के लिए सबसे पहले श्वास पर सन्तुलन, फिर मन में सन्तुलन, फिर शरीर में सन्तुलन होता है। फिर मन, आत्मा और शरीर तीनों का सन्तुलन होता है और यही ध्यान का पहला सूत्र है। स्वयं को सन्तुलित करना और इसलिए जो लोग ध्यान लगाते हैं बहुत कठिन परिस्थितियों में, किसी ख़ास के सामने ही टूटते हैं, सबके सामने नहीं क्योंकि वह ध्यान आपको आन्तरिक शक्ति के बारे में बताता है। आपके अन्दर जो आन्तरिक ऊर्जा होती है उसे जागृत करता है।


'यत्त ब्रह्माण्डे तत्त पिण्डे'

जो ऊर्जा अंतरिक्ष में चलती है वह यहां भी चलती है। इसलिए जब मैं अन्त॑मुखी हो जाता हूँ और समस्त नौ द्वारों को बन्द करके अन्दर की ओर झांकता हूँ तो मुझे पता चलता है कि मेरे अन्दर कौन-सा ईश्वर बैठा है और वह दिखता है| यह मूरत वह मरत नहीं होती है जो कलैण्डर में छपी होती है वह तो सिर्फ एक छवि है जब आप क्रियाओं का अभ्यास करेंगे तो आपको ऐसा प्रतीत होगा कि मेरे अन्दर बारूद है सिर्फ एक माचिस चाहिए। जैसे ही हम अपने नौ द्वारों को बन्द करके अन्दर झांकते हैं माचिस सुलग जाती है और वह बारूद ऊर्जा व प्रकाश के रूप में सामने आने लगता है। वही अभ्यास ऊर्जा होती है जिसे सब लोग अभ्यास के दौरान कई रंगों के रूप में महसूस करते हैं या देखते हैं। वही आन्तरिक ऊर्जा होती है कि जब वह बम का गोला फटता है तो बिल्कुल वैसा लगता है जैसे परमाणु बम आपके अन्दर बजा हो। शायद यही कारण था कि नील-बोर जिसने परमाणु बम का निर्माण किया था और जैसे ही उस बम के फटने के बाद का मंजर उसके सामने आया तो उसने श्रीमद्भागवतगीता के ग्यारहवें अध्याय के श्लोक पढ़े और उसने लिखा है कि मेरी परमाणु भौतिकी विज्ञान की प्रेरणा गीता से आई है। ऐसा अदभूत धर्म है हमारा जिसके हम अनुयायी हैं लेकिन हम अन्दर से मल नहीं हटा रहे है। ऊपर-ऊपर से दिखावा कर रहे हैं अपने आपको भक्त दिखाने का लेकिन हम भक्त नहीं हैं अगर होते तो इन सब चीजों के बारे में बहुत विस्तार से पता चलता और खुद को बदलते भी क्योंकि जो व्यक्ति खुद को बदल सकता है वो किसी को भी बदल सकता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार यह पांच विकार सब में होंगे। मनुष्य उससे परे हो ही नहीं सकता लेकिन यह हैं। विकार जब आपके द्वारा संचालित होते हैं तो यह आप के चतुष्ठ बन जाते हैं धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष यह पुरुषार्थ भी है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार यह विकार हैं। इनमें चार तो समान हैं- तो फिर आखिर ऐसा क्या है कि इन चार को तो चतुष्ठ बोला पुरुषार्थं कहा और उसको बोला विकार फर्क इतना है कि जो विकार हृदय में है जिसको मैंने लगाम दी है वो चतुष्ठ व पुरुषार्थ बनता है और जो मुझे नियंत्रित करता है वह विकार बन जाता है बस यही फर्क है। जब क्रोध मुझे control करता है तो मेरा पागलपन है, मानसिक विकार है और जब मैं क्रोध को control करता हूँ तो वह मेरी जिन्दगी की नीतियाँ हैं। अपने घर का बच्चा, Senior या junior कभी न कभी सभी को क्रोध आता है लेकिन यदि सोच-समझ कर क्रोध कर रहे हैं तो यह आपका पुरुषार्थ है और यदि यह क्रोध अनावश्यक है यानि आपको पता ही नहीं कि आपको कब कितना क्रोध आ रहा है, आपको पता भी नहीं कि आपके mood swing हो रहे हैं, जब ऐसा हो रहा हो तो यह आपका विकार है।


सन्तान उत्पन्न करनी हैं काम आवश्यक है नहीं तो धरती का बढ़ना ही रूक जाएगा। पुरुषार्थ के रूप में जब उसमें अन्धापन हो जाता है, काम कामुकता मे परिवर्तित हो जाता है तो यह विकार बन जाता है। पुरुषार्थ - Duty of the human being है नहीं तो ईश्वर की सृष्टि बढ़ेगी ही नहीं। कुरान में भी लिखा गया है कि ईश्वर ने हर चीज को जोड़े में बनाया है और यह सच है क्योंकि कोई भी चीज आधी नहीं हो सकती चाहे सिक्का हो या मन। यह कितना छोटा-सा फर्क है पुरुषार्थ और विकार में| फर्क है लगाम करने का। घोड़ा मुझे चला रहा है या मैं घोड़े को चला रहा हूँ। बस इसी से मनुष्य का पुरुषार्थं जाग्रत होता है। घोड़ा मुझे चलाता है तो मैं हाय-हाय करते घोड़े की पीठ से चिपक जाता हूँ और जब मैं घोड़े को चलाता हूँ तो सीना तान कर शान के साथ आगे बढ़ता हूँ- दुनिया मुझे देखती है। कभी-कभी

कुरान में भी लिखा गया है कि ईश्वर ने हर चीज को जोड़े में बनाया है और यह सच है क्योंकि कोई भी चीज आधी नहीं हो सकती चाहे सिक्का हो या मन यह कितना छोटा-सा फर्क है पुरुषार्थ और विकार में। फर्क है लगाम कसने का। घोड़ा मुझे चला रहा है या मैं घोड़े है को चला रहा हूँ। बस इसी से मनुष्य का पुरुषार्थ जाग्रत...

व्यंग्य में कहा जाता है कि जब घोड़ा मुझे चलाता है तो लगता है कि मैं दूल्हा हूँ और जब मैं घोड़े को चलाता हूँ तो लगता है कि मै सिपाही हूँ। तो मूलतः यही फर्क है पुरूषार्थ का और विकार का कौन किसकी लगाम कस रहा है। जो चीज़ Tools हैं यदि वही मालिक बन रही हैं तो यह विकार है, जैसे धन| धन केवल Tool है। धन की पूजा भी नहीं करनी चाहिए। धन बहुत कुछ है पर सब कुछ नहीं| धन यदि कम है तो दरिद्रता का अहसास देगा। धन जितनी जरूरत है उतना है तो स्वाभिमान का अहसास देगा और यदि धन आवश्यकता से अधिक होगा तो अभिमान का अहसास देगा। धन को हमें control करना है। धन हमें control नहीं करेगा इसलिए कभी धन के लिए काम मत करो काम करो, धन अपने आप आपका अनुसरण कर लेगा। स्वयं का सन्तुलन ध्यान का पहला कारक है -

ध्यान और Meditation दोनों अलग-अलग हैं। दूसरी चीज़ रहस्यों की खोज के लिए ध्यान कीजिए। हमारा जो चेतन मन है यह कभी भी रहस्यों को नहीं पकड़ सका। जितने वैज्ञानिक होते हैं उन सबके अवचेतन अधिक जाग्रत होते हैं। यह जो शक है यह भी दोधारी तलवार है। अगर शक निरर्थक है तो रिश्ता काट देगा शक यदि सार्थक है तो रिश्ता जोड़ देगा। आप चोर पकड़ते हैं तो कभी भी clear evidence से नहीं पकड़ते। आप धीरे-धीरे कड़ियाँ जोड़ते चले जाते हैं। जिसका intution जितना ताकतवर होता है या जिसका अवचेतन जितना मजबूत होता है वह उतने ही ज्यादा चोर पकड़ लेता है और जिसका अवचेतन जितना ज्यादा कमजोर होता है वो उतना ज्यादा ठगा जाता है। ज्योतिष पढ़ना अवचेतन को मजबूत करता है और ज्योतिष पढ़ने के लिए अवचेतन को मजबूत करना बहुत जरूरी है। इसका दूसरा कारण है कि रहस्यों की खोज के लिए ध्यान कीजिए, जिससे अवचेतन जाग्रत होता है जिस व्यक्ति का जितना ज्यादा अच्छा अवचेतन होगा वह उतना रचनात्मक व सार्थक होगा। वह अपने जीवन को अच्छे से व्यवस्थित कर पाएगा। सिद्धि प्राप्ति के लिए भी ध्यान करना चाहिए। यदि आप कोई विशेष सिद्धि प्राप्त करना चाहते हैं तो सिद्धियों के द्वारा यह सम्भव है कि एक हकला व्यक्ति स्पष्ट बोल सकता है। यह सम्भव है जिस व्यक्ति की आवाज नहीं निकलती है सिद्धि करने बैठेगा तो ऐसा बोलेगा कि कई लोग सुनेगें। एक व्यक्ति किसी से ढंग से बात नहीं कर सकता पर वह एक हजार की भीड़ में भी निर्वाध गति से बोल सकता है। कैसे, केवल पूजा और ध्यान करके।


ध्यान अद्भुत परिवर्तन लाता है। आपने अगर कोई चीज तुरंत पढ़ी है, आपको अपने अवचेतन को जागृत करने की शक्ति है तो आप परीक्षा में जाकर वही लिखेंगे जो आपको लिखना चाहिए था यदि आपने नहीं भी पढ़ा है तो लगभग वैसा बोलकर आएंगे जैसा वास्तव में है। बाद में सोचेंगे तो पता चलेगा कि यह पढ़ा कहाँ था, यह कैसे हो गया लेकिन यह होता है। ठीक उसी तरह से जैसे आप किसी नई जगह पर जाकर यह सोचते है मैं तो यहाँ कई बार आया हूँ यह जगह देखी-पहचानी सी लग रही है। किसी को कोई व्यक्ति देखा पहचाना सा लगता है। यह अवचेतन का कमाल है जिसमें कई जन्मों के संचित भरे रहते हैं कई जन्मों की यादें भरी होती हैं ध्यान उसे कुरेदता है और इसलिए जब-जब हम ध्यान में बैठते हैं तो जो हमारे अन्दर की ऊर्जा होती है वह उस अवचेतन को जाग्रत करती और इसका Biological Functioning देखा जा सकता है, मापा जा सकता है क्योंकि आपकी जो Penial Body होती है वह Activate हो जाती है और Pituitary नीचे चली जाती है। यह इसका वैज्ञानिक कारण है और इसलिए जो ध्यान करते हैं उनकी Penial Body जिसे आज्ञा चक्र कहते हैं, यह मटर के दाने के बराबर होती है जो समान्यतः जाग्रत नहीं होती कोई उसमें Activity नहीं होती उसमें Activity तब होती है जब हम ध्यान करते हैं तो कहीं जब आन्तरिक स्पन्दन प्रारम्भ होता है वो केवल उसी से जाग्रत होता है और जब वह जाग्रत होता है तो उसमे से कुछ hormonal स्राव शुरू होते हैं उसको Melatonin कहते हैं। यही वह प्रक्रिया होती है जो आपके व्यक्तित्व को विलक्षणता प्रदान करती है जो आपकी त्वचा, मस्तक, आवाज को भी विलक्षणता प्रदान करती है। यही वह ध्यान है इसलिए अगर Physical Science को लिया जाए तो ध्यान एक पूरी तरह से Biological Process है तो रहस्यों की खोज के लिए आपको ध्यान करना चाहिए। मैं पुनः कहूंगा कि ध्यान क्यों करें? ध्यान से ईश्वर प्राप्त नहीं होते बल्कि ईश्वर प्राप्ति के रास्ते खुलते हैं। ध्यान से आप अपने व्यक्तिव में परिवर्तन कर सकते हैं। ध्यान से आप अपने काल में परिवर्तन कर सकते हैं। यदि आपके ऊपर दुर्घटना की आशंका है तो खूब विधि से ध्यान करिए। यदि आपको लगता है कि मेरी जिन्दगी में ऐसा व्यक्ति ना आये जो मुझे धोखा दे आप ध्यान करिए वह धोखा आपके साथ नहीं होगा। यदि आपको लगता है कि मैं पढ़ नहीं पा रहा हूँ और मेरी एकाग्रता कमजोर है तो आप ध्यान करिए, एकाग्रता बढ़ेगी अपने आप होगा। इसलिए ध्यान करना चाहिए अगर बहुत संक्षिप्त में कहूँ तो विलक्षणता प्राप्त करने के लिए हमें ध्यान ही करना ही चाहिए क्योंकि और कोई भी चीज़ हमें विलक्षण बना ही नहीं सकती।


एक और महत्वपूर्ण चीज पर हम वार्तालाप करेंगे की ध्यान में बाधाएं क्यों आती हैं? आप थोड़ी गहराई में उतरने की कोशिश कीजिए... जिन्दगी में कुछ तो गहराई होनी चाहिए सब कुछ ऊपर-ऊपर नहीं होना चाहिए। इसी वजह से रिश्तों में भी विवाद होने लगे हैं। हम अक्सर यह कहते हैं कि जब ध्यान करने बैठो तो कुछ न कुछ और ही ध्यान आता है यानि ध्यान के अलावा सब कुछ याद आता है। चंचलता, अस्थिरता और स्वार्थ यह तीन बाधाएं हैं। गीता के तीसरे अध्याय में अर्जुन का धैर्य कमजोर हो गया और भगवान श्रीकृष्ण उन्हें प्रवचन दिये जा रहे थे। उन्होंने पूछा- मन क्या है? मन कहाँ है? कैसे साधुं इस मन को जो वानर कि तरह इधर-उधर भटकता रहता है। यह मन जो हवा की तरह है मेरी मुट्ठी में आने को तैयार ही नहीं है तो जो चीज मुझे दिख ही नहीं रही उसे मैं कैसे साधुं| जो चीज विचारों और हाथों से भी पकड़ नहीं आ रही मैं उसे कैसे साधू| देखिए अर्जुन जैसा धनुर्धर भी एकाग्रता, ध्यान और मन की समस्या से प्रभावित था, फिर हम तो बहुत साधारण लोग हैं तो मूल तत्व क्या है? चंचलता अर्थात् मन की चंचलता और यह चंचलता क्यों रहती है? क्योंकि लगाव बहुत ज्यादा होता है हर अपनी चीज से लगाव जरूरी तो है लेकिन फिर वही बात आती है कि कौन किसको लगाम कर रहा है। वस्तुएं मुझे लगाम कर रही हैं या मैं वस्तुओं को लगाम कर रहा हूँ और अत्यधिक लगाव जब भी होगा, मन में चंचलता होगी। जैसे कि मेरी गाड़ी, मेरी नौकरी, मेरी तन्ख्वाह और यह लगाव धीरे-धीरे इतना बढ़ता जाता है कि आपके मन की चंचलता गहरी होती चली जाती है और चंचल मन ध्यान नहीं कर सकता। आँखे बन्द करके बैठ सकते हैं लेकिन ध्यान नहीं कर सकते। ध्यान की सबसे बड़ी बाधा है चंचल मन उसको भी control किया जा सकता है लेकिन एक दिन में control नहीं होगा। बहुत लम्बा वक्त चाहिए आपको बहुत सारे शारीरिक व्यायाम करने पड़ेगें। श्वास से सम्बन्धित व्यायाम करने पड़ेंगे, तब जाकर आपका

माहौल बहुत आवश्यक है और अक्सर हम लोग स्वय भी अपना माहौल बिगाड़ते हैं जैसे मोबाइल लेकर ध्यान में बैठेंगे या पूजा में बैठेंगे। मोबाइल लेकर पूजा में बैठे हैं। एक आँख खुली है कि बच्चा कहाँ है या पूजा मे बैठे हैं तो डोरबेल पर ध्यान लगा हुआ है कि कब घण्टी बजेगी क्योंकि अभी तक दूध नहीं आया आदि...

यह चंचल मन control में आएगा।

एक और विकार है अज्ञानता- हमें पता ही नहीं हम कर क्या रहे हैं। मुझे मेरे आने का उद्देश्य नहीं पता, मुझे मेरे होने का उद्देश्य ही नहीं पता, मेरे कहीं जाने का उद्देश्य ही नहीं पता, यही अज्ञानता है और यही अज्ञानता मन की बाधाओं को बढ़ा देती है। लिहाजा मन ध्यान में नहीं जाएगा क्योंकि ध्यान में मन रमता है, शरीर नहीं हमेशा ध्यान रखिएगा।


Quantum physics का तीसरा नियम है कि A particle has to be converted into weight तभी वह Dismantle होगा Particle is not a weight। आप लोगों ने सुना होगा कि कुछ लोग स्वयं को देख सकते हैं तो क्या ऐसी कोई सिद्धि होती है? यह बहुत आसान है कठिन बात नहीं है। आप स्वयं को देख सकते हैं, अपने शरीर से निकल कर स्वयं को देख सकते हैं और वह यादें आपको रहेगी। इसकी शुरुआत आसान नहीं है। लेकिन यदि आप ध्यान कर सकते हैं और आपका ध्यान लगता है। यदि आप शवासन कर सकते हैं तो यह बहुत मुश्किल कार्य भी नहीं बस शुरुआत थोड़ी-सी कठिन है, वह भी केवल इसलिए कठिन है क्योंकि हममें धैर्य नहीं होता, हम तुरन्त परिणाम चाहते हैं यह भी हमारे लिए मनोरंजन हो जाता है। मनोरंजन आवश्यक नहीं है जबकि ध्यान करना उतना ही जरूरी है जितना कि पानी पीना, भोजन करना।


अज्ञानता दूर करना बहुत बड़ा कार्य है।

एक और चीज है माहौल। कई बार आप पाते हैं कि लाख शोर के बाद भी आपका ध्यान लग जाता है और कहीं आप अकेले बैठे हैं, बन्द कमरे में हैं, इसके बाद भी आपका ध्यान नहीं लगता। माहौल बहुत आवश्यक है और अक्सर हम लोग स्वयं भी अपना माहौल बिगाड़ते हैं जैसे Mobile लेकर ध्यान में बैठेंगे या पूजा में बैठेंगे। Mobile लेकर पूजा में बैठे हैं, एक आँख खुली है कि बच्चा कहाँ है या पूजा में बैठे हैं तो Doorbell पर ध्यान लगा हुआ है कि कब घण्टी बजेगी क्योंकि अभी तक दूध नहीं आया और जिनको ध्यान लगाना होगा वह कितने भी शोर में ध्यान लगा लेगें, यह अवचेतन की प्रक्रिया है। यह माहौल आपको अन्दर से ज्यादा प्रभावित करता है, बजाय की बाहर से| यदि कोई आपको बिल्कुल ही हिला रहा हो तो अलग बात है। अन्यथा आप जहाँ चाहें और जितने शोर में चाहें ध्यान में जा सकते हैं। गाड़ी में बैठे हुए भी ध्यान में जा सकते हैं निर्भर करता है कि Power of concentration कितनी है| जुनून होना चाहिए। जिन्दगी जीने का अपना एक जुनून होता है। वह होगा तो ध्यान लगेगा अन्यथा नहीं लगेगा। बहुत अच्छी खुशबू हैं लेकिन इस खुशबू का फायदा आप तब उठा पाएंगे जब आपके अन्दर से आवाज आएगी। हममें से कितने लोग सुबह-सुबह भजन सुनने का प्रयास करते हैं, कभी आप परीक्षण करिए बहुत मन हो रहा है संगीत सुनने का और हमने कोई भी अच्छा-सा गाना लगा दिया और जब वह खत्म हो जाए तो स्वयं से पूछिये क्या आप इसका एक-एक शब्द ठीक से सुन पाए और जब आप अपना पंसदीदा गाना लगाइएगा और तीन मिनट के गाने में हम पूरी तरह गाने में थे जबकि वह पूरी तरह मनोरंजन है| यह वही मनोरंजन था जो हम चाहते थे फिर भी उसमें हम नहीं हैं ऐसा क्यों इसका मतलब गड़बड़ी आन्तरिक है और जिसके अन्दर शान्ति स्थिरता, सरलता, सौम्यता और ठहराव होता है उसको यह चीजें बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं कर सकती और वह कहीं भी बैठकर ध्यान लगा सकता है। आपको क्या लगता है कि जंगल में शोर बहुत कम होता है नहीं। जिस वक्त पहाड़ों से कटकर हवा आती है और रात में झींगुर बोलने शुरू होते हैं तो कानों में रूई लगानी पड़ जाती है।


कोयल की आवाज़ कितनी मधुर लगती है पर जब असंख्य कोयलें आपके सिर पर आकर बोलती हैं तो बहुत घबराहट होने लगती है और अन्दाजा लगाइए जब दसियों मोरनियां कुटिया के सामने आवाजें करने लगे फिर ऐसी हृदय विदारक स्थिति उत्पन्न हो जाती है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते| एक हाथी तीन से चार किलोमीटर की दूरी पर भी चिंघाड़ता है तो व्यक्ति कांप उठता है तो ऐसा नहीं है कि जंगल में शोर नहीं है। शोर है तो शान्ति तो खुद में ही तलाशनी होगी तो इसलिए ध्यान करने के लिए बाहर की जगह आन्तरिक वातावरण को महत्व देना चाहिए।


अब बात आती है आसन की। सामान्यतः हम जो ध्यान करते हैं उसमें सुखआसन में बैठ जाते हैं या पद्मासन या वज्रआसन में बैठ जाते हैं, जो बहुत कठिन है लेकिन भगवान श्रीकृष्ण क्या कहते हैं। बस बैठ जाओ जिस तरीके से या जिस तरह आपका मन लगे बैठ जाओ। वही आपका आसन हो गया। यदि आप खड़े होकर भी ध्यान करना चाहें तो खड़े होकर भी कर सकते हैं बैठ कर करना चाहें तो बैठ कर करें। यानि आसन मतलब बैठना है, कैसे बैठना है- स्थिर बैठना है। स्थिरता, चित्त की भी और शरीर की भी| इस आसन के उपांग होते हैं जैसे वज्रआसन हो गया। इसलिए इसमें बहुत ज्यादा तकनीकी होने की जरूरत नहीं है। आसन सुलभ होना चाहिए। बाकी जब तक आगे की ध्यान की यात्रा पर ले जाऊँ तब तक जो प्राथमिक अनिवार्यताएँ बताई हैं, उनका अभ्यास कीजिए। राह कठिन है पर उस पर चलना असंभव नहीं है। एक अलौकिक शक्ति अवश्य आपकी मदद करेगी।

- प्रोफ़ेसर पवन सिन्हा 'गुरूजी'




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